bahushalini

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Tuesday, February 12, 2008

बैक्टीरिया से मिलेगी हाइड्रोजन की एनर्जी

एक अमेरिकी वैज्ञानिक ने एक खास किस्म के बैक्टीरिया से हाइड्रोजन पैदा करने का तरीका ढूंढ निकाला है। उन्होंने खराब हो चुके खाद्य पदार्थों में पाए जाने वाले ई-कोली बैक्टीरिया को भविष्य का उर्जा स्त्रोत करार दिया है और कहा है कि इससे निकाले गए हाइड्रोजन के जरिए घरेलू उपकरणों से लेकर कारों तक को चलाया जा सकता है। टेक्सस ए-एंड-एम यूनिवर्सिटी के केमिकल इंजीनियरिंग विभाग में प्रोफेसर टॉमस वुड का कहना है कि ई-कोली में जिनेटिक संशोधन करने के बाद इससे काफी मात्रा में हाइड्रोजन प्राप्त किया जा सकता है। वुड ने अपनी रिसर्च के ब्यौरे 'माइक्रोबायल बायोटेक्नॉलजी' मैगजीन में प्रकाशित किए हैं। हालांकि वुड ने यह भी स्वीकार किया कि अभी इस खोज को कमर्शल इस्तेमाल तक पहुंचाने की दिशा में काफी काम किया जाना बाकी है, लेकिन साथ ही उम्मीद जताई कि शुरूआती सफलता हाइड्रोजन आधारित विश्व अर्थव्यवस्था की राह में मील का पत्थर साबित होगी। गौरतलब है कि हाइड्रोजन को क्लीन, इफिशियंट और रिन्यू करने योग्य ईंधन माना जाता है। इससे पोर्टेबल इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से लेकर ऑटोमोबाइल और पावर प्लांट तक चलाने की संभावना जताई जाती रही है। ई-कोली से हाइड्रोजन प्राप्त करने के लिए वुड ने इस बैक्टीरिया के डीएनए से 6 चुनिंदा जीन हटा दिए। ऐसा करते हुए उन्होंने असल में बैक्टीरियम को हाईड्रोजन पैदा करने वाली एक ऐसी मिनी फैक्ट्री में तब्दील कर दिया, जो ईंधन के तौर पर चीनी से चलाई जाती है। वैज्ञानिक शब्दों में कहें तो वुड ने बैक्टीरिया में प्राकृतिक तौर पर होने वाली ग्लूकोज-कन्वर्जन प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर तेजी ला दी। वुड के मुताबिक इस बैक्टीरिया में 5000 ऐसे जीन होते हैं, जो उसे पर्यावरण में होने वाले बदलाव को झेलने की ताकत देते हैं। कुछ जीन हटा देने से बैक्टीरिया की क्षमता घट जाती है और यह कम नुकसानदेह हो एक अमेरिकी वैज्ञानिक ने एक खास किस्म के बैक्टीरिया से हाइड्रोजन पैदा करने का तरीका ढूंढ निकाला है। उन्होंने खराब हो चुके खाद्य पदार्थों में पाए जाने वाले ई-कोली बैक्टीरिया को भविष्य का उर्जा स्त्रोत करार दिया है और कहा है कि इससे निकाले गए हाइड्रोजन के जरिए घरेलू उपकरणों से लेकर कारों तक को चलाया जा सकता है। टेक्सस ए-एंड-एम यूनिवर्सिटी के केमिकल इंजीनियरिंग विभाग में प्रोफेसर टॉमस वुड का कहना है कि ई-कोली में जिनेटिक संशोधन करने के बाद इससे काफी मात्रा में हाइड्रोजन प्राप्त किया जा सकता है। वुड ने अपनी रिसर्च के ब्यौरे 'माइक्रोबायल बायोटेक्नॉलजी' मैगजीन में प्रकाशित किए हैं। हालांकि वुड ने यह भी स्वीकार किया कि अभी इस खोज को कमर्शल इस्तेमाल तक पहुंचाने की दिशा में काफी काम किया जाना बाकी है, लेकिन साथ ही उम्मीद जताई कि शुरूआती सफलता हाइड्रोजन आधारित विश्व अर्थव्यवस्था की राह में मील का पत्थर साबित होगी। गौरतलब है कि हाइड्रोजन को क्लीन, इफिशियंट और रिन्यू करने योग्य ईंधन माना जाता है। इससे पोर्टेबल इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से लेकर ऑटोमोबाइल और पावर प्लांट तक चलाने की संभावना जताई जाती रही है। ई-कोली से हाइड्रोजन प्राप्त करने के लिए वुड ने इस बैक्टीरिया के डीएनए से 6 चुनिंदा जीन हटा दिए। ऐसा करते हुए उन्होंने असल में बैक्टीरियम को हाईड्रोजन पैदा करने वाली एक ऐसी मिनी फैक्ट्री में तब्दील कर दिया, जो ईंधन के तौर पर चीनी से चलाई जाती है। वैज्ञानिक शब्दों में कहें तो वुड ने बैक्टीरिया में प्राकृतिक तौर पर होने वाली ग्लूकोज-कन्वर्जन प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर तेजी ला दी। वुड के मुताबिक इस बैक्टीरिया में 5000 ऐसे जीन होते हैं, जो उसे पर्यावरण में होने वाले बदलाव को झेलने की ताकत देते हैं। कुछ जीन हटा देने से बैक्टीरिया की क्षमता घट जाती है और यह कम नुकसानदेह हो जाता है।

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